शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

बस पिता नहीं, मेरे प्राण भी हैं

"बस पिता नहीं, मेरे प्राण भी हैं,
उस बचपन का अभिमान भी हैं,
माँ वसुन्धरा के आँचल में,
जीवनदाता,वरदान भी हैँ।

जब-जब भी चला मै राहों में,
आई बाधाएँ बाहों में,
हर संकट मे वो निदान भी हैं,
बस पिता नहीं, मेरे प्राण भी हैं।

वो अडिग कल्पना बचपन कि,
है उपज नहीं एकल मन की,
मेरी सृष्टी का संविधान भी हैं,
बस पिता नहीं, मेरे प्राण भी हैं।"
-सुमन कु॰ "रौशन"

बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

शायरी-2

"जो मेरे ख्वाबों में आकर मेरी शायरी बन जाए,
नसीबों से लड़ कर मेरी जिंदगी बन जाए,
उसके लिए हर लम्हा कुछ खास करता हूँ,
मैं उस मुहब्बत कि तलाश करता हूँ"!!
- सुमन "रौशन"

शायरी

"कभी महफ़िल में लड़ भीरे,
कभी तन्हाई में डर उठे,
अजी जेवर-बिंदिया छोड़ो,
हम उसकी अंगराई पे मर मिटे"!!
-सुमन "रौशन"