शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

बस पिता नहीं, मेरे प्राण भी हैं

"बस पिता नहीं, मेरे प्राण भी हैं,
उस बचपन का अभिमान भी हैं,
माँ वसुन्धरा के आँचल में,
जीवनदाता,वरदान भी हैँ।

जब-जब भी चला मै राहों में,
आई बाधाएँ बाहों में,
हर संकट मे वो निदान भी हैं,
बस पिता नहीं, मेरे प्राण भी हैं।

वो अडिग कल्पना बचपन कि,
है उपज नहीं एकल मन की,
मेरी सृष्टी का संविधान भी हैं,
बस पिता नहीं, मेरे प्राण भी हैं।"
-सुमन कु॰ "रौशन"

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